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मौत की दस्तक देता डंपिंग यार्ड, नौ गांवों के अस्तित्व पर संकट

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ग्रेटर नोएडा। विकास प्राधिकरण का एक महत्वाकांक्षी कचरा प्रबंधन प्रोजेक्ट आज हजारों परिवारों के लिए जी का जंजाल बन गया है। अस्तौली गांव में बनाए गए इस ‘डंपिंग एरिया’ के ट्रायल मात्र ने आसपास के नौ गांवों में ऐसा कोहराम मचाया है कि अब ग्रामीण ‘करो या मरो’ की स्थिति में आ गए हैं। पिछले एक महीने से अधिक समय से धरने पर बैठे किसान और ग्रामीण अब इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ पर ले जाने के लिए तैयार हैं।

गुमराह कर ली गई जमीन

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने जब उनसे जमीन का अधिग्रहण किया, तो उन्हें अंधेरे में रखा गया। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेताओं और स्थानीय निवासियों का आरोप है कि उन्हें बताया गया था कि यहां कोई बड़ा उद्योग लगेगा या हाउसिंग प्रोजेक्ट आएगा जिससे विकास होगा। लेकिन जब कचरा आना शुरू हुआ और मशीनों का ट्रायल हुआ, तब जाकर सच सामने आया।
“किसानों को गुमराह किया गया। हमें लगा उद्योग लगेगा, लेकिन यहां तो खत्ता (कूड़ेदान) बना दिया गया। अब सांस लेना दूभर है।

ट्रायल के तीन दिन और दहशत की रातें

रिपोर्ट के अनुसार, जब 6-7 तारीख के आसपास प्लांट का ट्रायल किया गया, तो पूरी फिजा ही बदल गई। ग्रामीणों ने बताया:

आंखों में जलन: हवा में इस कदर प्रदूषण था कि लोगों की आंखों में मिर्ची जैसी जलन होने लगी।

बीमार होते लोग: गांव के चार बुजुर्ग वेंटिलेटर पर हैं। सांस के मरीजों की हालत गंभीर है।

पशु और खेती पर असर: प्लांट से सटे करीब 700-800 बीघे के आम के बागों में फल झड़ने लगे हैं और कीड़े पैदा हो रहे हैं। पशुओं में भी सांस की बीमारियां देखी जा रही हैं।

पानी का प्रदूषण: ग्रामीणों का दावा है कि जमीन के पानी में भी अब बदबू आने लगी है।

नौ गांवों की 1 लाख आबादी खतरे में

यह डंपिंग यार्ड केवल अस्तौली तक सीमित नहीं है। इसकी जद में दो जिलों के नौ गांव आते हैं:

गौतम बुद्ध नगर: अस्तौली, देवटा, आजमपुर गढ़ी, बांजरपुर, सरकपुर।

बुलंदशहर: हिरनौटी, कमालपुर, रौनी सलोनी, फतेहपुर मकरमपुर।
लगभग 90 हजार से 1 लाख की आबादी के बीच बना यह प्रोजेक्ट स्वास्थ्य के लिहाज से एक ‘टाइम बम’ माना जा रहा है। पास में ही 3-4 स्कूल और धार्मिक स्थल भी हैं।

अधिकारियों का रवैया और ग्रामीणों का रोष

धरने पर बैठे ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी रोष है कि एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी शासन का कोई बड़ा अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं आया। प्राधिकरण के कुछ अधिकारी आए, लेकिन वे केवल मीटिंग का आश्वासन देकर चले गए।
ग्रामीणों ने दो-टूक शब्दों में कहा है या तो हमें यहां से शिफ्ट कर दो और हमारी जमीन का मुआवजा दो, या इस प्रोजेक्ट को यहां से हटाओ। किसानों ने चेतावनी दी है कि वे अब पीछे नहीं हटेंगे, चाहे उन्हें किसी भी हद तक जाना पड़े।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

अस्तौली का यह विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। सवाल यह उठता है कि क्या विकास की वेदी पर हजारों जिंदगियों की बलि चढ़ाना जायज है? अगर ट्रायल में ही लोगों का दम घुट रहा है, तो प्रोजेक्ट पूर्ण रूप से शुरू होने पर क्या स्थिति होगी? अब देखना यह है कि प्रशासन ग्रामीणों की जायज मांगों पर क्या कदम उठाता है या फिर यह संघर्ष किसी बड़ी अनहोनी की ओर बढ़ता है।

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