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‘कोटे के अंदर कोटा’: महिला आरक्षण बिल में ओबीसी हिस्सेदारी को लेकर दिल्ली की सड़कों पर उठी आवाज़
नई दिल्ली | संसद से पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण बिल) जहाँ एक ओर महिला सशक्तिकरण के बड़े दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली की सड़कों पर इसे लेकर विरोध के स्वर भी तेज हो गए हैं। प्रदर्शनकारी महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि 33 प्रतिशत आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से ‘कोटे’ का प्रावधान न करना उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय है।
‘कोटे के अंदर कोटा’
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि सामान्य वर्ग की महिलाओं की तुलना में ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति काफी भिन्न है। प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है, महिलाओं की कोई जाति नहीं होती, यह कहना सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन धरातल पर सच्चाई अलग है। सामान्य वर्ग की महिलाएं संसाधनों और पैसे से मजबूत हैं, वे चुनाव लड़ सकती हैं। लेकिन ओबीसी महिलाएं बिना आरक्षण के पुरुषों और समृद्ध वर्ग के सामने असहाय हैं।
क्यों जरूरी है ओबीसी कोटा?
चर्चा के दौरान कुछ प्रमुख तर्क सामने आए जो ओबीसी आरक्षण की अनिवार्यता को दर्शाते हैं:
संसाधनों का अभाव: प्रदर्शनकारियों के अनुसार, चुनाव अब बहुत खर्चीले हो गए हैं। ओबीसी परिवारों के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे अपनी महिलाओं को चुनाव में उतार सकें। यदि आरक्षण अनिवार्य होगा, तो पार्टियों की मजबूरी होगी कि वे उन्हें टिकट दें।
पंचायती राज का उदाहरण: कार्यकर्ताओं ने याद दिलाया कि राजीव गांधी के समय पंचायती राज संस्थानों में ओबीसी महिलाओं को आरक्षण दिया गया था। यदि स्थानीय निकायों में यह संभव है, तो लोकसभा और विधानसभाओं में क्यों नहीं?
प्रतिनिधित्व का सवाल: यह तर्क दिया गया कि सदन में अभी भी ओबीसी महिलाओं की संख्या नगण्य है। बिना कोटे के, वे कभी भी निर्णायक भूमिका में नहीं आ पाएंगी।
2029 का ‘लॉलीपॉप’ और जनगणना का पेंच
केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए प्रदर्शनकारियों ने इस बिल को ‘2029 का लॉलीपॉप’ करार दिया। उनका कहना है कि जब सरकार रातों-रात बड़े राजनीतिक फैसले ले सकती है, तो इस आरक्षण को तत्काल लागू करने में देरी क्यों?
साथ ही, डेटा को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि, आरक्षण 2011 की जनगणना के बजाय 2027 के नए डेटा (जाति जनगणना) के आधार पर लागू हो। पुरानी जनगणना के आधार पर एससी-एसटी की आरक्षित सीटों में भी नुकसान होने की आशंका जताई गई है।
‘अधिकार बनाम अवसर’ की बहस
पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली। जब यह सवाल पूछा गया कि “बिना आरक्षण के भी कई ओबीसी नेता सदन में हैं, तो महिलाओं को अलग से आरक्षण क्यों चाहिए? तो जवाब मिला अगर आज हम यह मान लें कि बिना आरक्षण के काम चल जाएगा, तो कल सरकार एससी-एसटी का आरक्षण भी यह कहकर खत्म कर देगी कि आपके नेता तो जीत ही रहे हैं। यह हमारे हक की लड़ाई है।
फिलहाल, महिला आरक्षण बिल को लेकर यह असंतोष एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर रहा है। मांग स्पष्ट है आरक्षण में सभी वर्गों की महिलाओं की समान भागीदारी हो, ताकि संसद केवल समृद्ध वर्ग की महिलाओं का केंद्र बनकर न रह जाए।
यह रिपोर्ट दिल्ली में हुए हालिया प्रदर्शनों और वहां मौजूद महिलाओं के बयानों पर आधारित है। जनता की मांग है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे में ओबीसी महिलाओं की हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की जाए।
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