बतंगड़ स्पेशल
विकास की राह में ढहते आशियाने: दालमंडी में बुलडोजर की गर्जना के बीच सिसकती जिंदगियां
वाराणसी | ऐतिहासिक दालमंडी इन दिनों धूल के गुब्बार और मलबे के ढेर में तब्दील हो रही है। प्रशासन इसे ‘सबसे मॉडर्न’ सड़क बनाने की तैयारी में है, लेकिन इस आधुनिकता की नींव उन आंसुओं पर रखी जा रही है, जिनके पास अब सिर छिपाने को छत तक नहीं बची। 17 मीटर चौड़ी सड़क बनाने के अभियान में मंगलवार को 17 और मकानों पर बुलडोजर चला, जिनमें से एक घर की कहानी सुनकर पत्थर दिल भी पसीज जाए।
ऊपर चल रहा हथौड़ा, नीचे मौत और जिंदगी की जंग

दालमंडी के एक जर्जर हो रहे मकान में दिल दहला देने वाला मंजर देखने को मिला। घर की छत को प्रशासन के मजदूर और मशीनें ध्वस्त कर रही थीं, जबकि ठीक उसी के नीचे वाले कमरे में दो गंभीर मरीज अपनी आखिरी उम्मीदें थामे लेटे थे। घर के बुजुर्ग मुखिया, जो तीन दिन पहले ही हार्ट अटैक के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज होकर आए हैं, सदमे की हालत में पत्थर बने बैठे हैं। वहीं, उनकी बेटी नरिन सिद्दीकी, जो कभी शिक्षिका हुआ करती थीं, आज बोन टीबी के कारण बिस्तर से उठने में भी लाचार हैं।
तहसीन अरशद ने कहा, ऊपर कारवाई हो रही है, हमें अपनी जान का भी खतरा है, लेकिन हम जाएं तो जाएं कहां? न सामान हटा पाए, न कोई ठिकाना मिला।
मकान टूटने के सदमे से टूटी एक बुजुर्ग महिला की आंखों के आंसू नहीं सूख रहे। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, इतनी मेहनत से बच्चों को पाला, यह घर बनाया। अब जब छत टूट रही है, तो बस यही दिल करता है कि अल्लाह हमें मौत दे दे ताकि यह मंजर न देखना पड़े। न खाना अच्छा लग रहा है, न पानी।

किराए के बोझ और भविष्य की चिंता
चौड़ीकरण की इस जद में आने वाले परिवारों की आर्थिक रीढ़ भी टूट गई है। प्रभावित परिवारों ने बताया कि घर के नीचे स्थित दुकानों से मिलने वाले किराए से ही उनका गुजारा होता था। पिछले दो-तीन महीनों से दुकानें बंद हैं और अब वे टूट रही हैं। शहर में किराए के मकान इतने महंगे हैं कि इन परिवारों के लिए वहां जाना मुमकिन नहीं है।
ऐतिहासिक वजूद का अंत और प्रशासन की दलील
दालमंडी का लगभग 200 साल पुराना इतिहास अब मलबे में मिलता जा रहा है। मुसाफिरखाना और पुरानी अदालत जैसे ऐतिहासिक स्थल अब केवल यादों में रहेंगे। प्रशासन का कहना है,
लक्ष्य: मई के अंत तक चौड़ीकरण का काम पूरा करना।
प्रगति: अब तक कुल 60 मकानों पर कार्रवाई हो चुकी है।
विज़न: जून से यहां बनारस की सबसे आधुनिक और सुंदर सड़क का निर्माण शुरू होगा।
स्थानीय समाजसेवी शकील अहमद ‘जादूगर’ कहते हैं कि विकास जरूरी है और लोग रजामंदी भी दे रहे हैं, लेकिन सरकार को उन गरीब दुकानदारों और निवासियों का ख्याल जरूर रखना चाहिए जिनके पास आय का दूसरा कोई साधन नहीं है।
दालमंडी की तंग गलियां अब चौड़े रास्तों में बदल रही हैं। विकास की इस चमक में शहर तो शायद संवर जाएगा, लेकिन उन चेहरों की झुर्रियों का क्या, जिनका ‘कल’ आज मलबे के साथ ढह गया? प्रशासन के लिए यह सिर्फ एक ‘क्लियरेंस’ है, पर इन परिवारों के लिए यह उनकी पूरी दुनिया का अंत है।
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