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शिक्षा के ‘गढ़’ में खंडहर होता बच्चों का भविष्य, करोड़ों की बिल्डिंग भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी
मानिकपुर | कहने को मानिकपुर शिक्षा का केंद्र है, जहाँ पॉलिटेक्निक और डिग्री कॉलेजों की भरमार है। लेकिन धरातल की हकीकत इसके उलट है। यहाँ एक ऐसा विद्यालय है जहाँ प्राइमरी स्कूल और इंटर कॉलेज की छात्राएं एक ही जर्जर परिसर में पढ़ने को मजबूर हैं। प्रशासन की अनदेखी का आलम यह है कि करोड़ों की लागत से बनी नई बिल्डिंग पिछले 12 सालों से ‘अंडर कंस्ट्रक्शन’ बताकर खंडहर में तब्दील की जा रही है।
जर्जर छत और मौत का साया
विद्यालय की हालत इतनी खस्ता है कि छतों से लोहे के गार्टर और पट्टियाँ टूटकर गिर रही हैं। कक्षा 6 और 7 के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने बताया कि बरसात के दिनों में वे बाल-बाल बचे जब उनके बैठने वाली जगह पर छत का हिस्सा गिर गया। स्कूल में न तो साफ-सफाई है और न ही सुरक्षा के इंतजाम।
जब हम कक्षा 6 में थे, तब हमारे सिर पर गाडर गिरते-गिरते बचा। डर के मारे हमें कई बार छुट्टियाँ दे दी जाती हैं या हमें दूर बिठाया जाता है।
भ्रष्टाचार की गवाही देती ‘अलंकार योजना’

रिपोर्ट के मुताबिक, इंटर कॉलेज के लिए ‘अलंकार योजना’ के तहत बजट आवंटित किया गया था। मायावती सरकार के समय शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज भी अधूरा है। पास ही बनी एक भव्य इमारत पिछले 10-12 वर्षों से वीरान खड़ी है। 12 साल से तैनात एक चौकीदार इस खंडहर की रखवाली कर रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारियों और ठेकेदारों ने मिलकर बजट का बंदरबांट कर लिया है, जिसके कारण करोड़ों की संपत्ति अब झाड़ियों और मलबे में तब्दील हो रही है।
कॉलेज में टीचर नहीं, भविष्य पर प्रश्नचिह्न

इंटर कॉलेज की छात्राओं की स्थिति और भी दयनीय है। कॉलेज में साइंस साइड की सुविधा तो कागजों पर है, लेकिन धरातल पर शिक्षकों का अकाल है। छात्राओं ने बताया, कॉलेज में कुल 6 विषय हैं, लेकिन कक्षाएं सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी की लगती हैं, अन्य विषयों के शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं, प्रिंसिपल से शिकायत करने पर भी कोई ठोस जवाब नहीं मिलता।
प्रशासनिक विफलता और खोखले दावे

एक तरफ सरकार ‘पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया’ का नारा देती है, वहीं मानिकपुर की यह तस्वीर इन दावों की पोल खोलती है। छोटे बच्चों के शोर-शराबे के बीच इंटर कॉलेज की छात्राएं बोर्ड परीक्षा की तैयारी करने को मजबूर हैं। सवाल यह उठता है कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी इस बदहाली पर मौन क्यों हैं? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद अगर छात्रों को 2×3 के कमरों में बैठकर धूल और धुएं के बीच पढ़ना पड़ रहा है, तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी है।
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