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प्रयागराज में गंगा में गिर रहा दूषित पानी, नमामि गंगे पर उठे सवाल

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प्रयागराज | धार्मिक आस्था की प्रतीक और करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र गंगा नदी एक बार फिर प्रदूषण को लेकर चर्चा में है। प्रयागराज के नागवासुकी मंदिर क्षेत्र में गंगा में गिरते दूषित पानी को लेकर स्थानीय लोगों, छात्रों और संत समाज ने चिंता जताई है। लोगों का कहना है कि सरकार द्वारा गंगा सफाई के लिए बड़े स्तर पर योजनाएं चलाए जाने के बावजूद आज भी कई स्थानों पर नालों और सीवेज का पानी गंगा में मिल रहा है।

नागवासुकी क्षेत्र में दिखा दूषित पानी
प्रयागराज के प्राचीन नागवासुकी मंदिर के पास गंगा में गंदा पानी गिरता दिखाई दिया। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह पानी आसपास के इलाकों के नालों और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) से होकर आता है। हालांकि प्रशासन का दावा है कि पानी को शुद्ध करने के बाद ही नदी में छोड़ा जाता है, लेकिन मौके पर मौजूद लोगों ने इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाए। एक स्थानीय छात्र ने कहा कि “पहली नजर में यह पानी ऐसा नहीं लगता कि इसे गंगा में प्रवाहित किया जाना चाहिए।”

‘नमामि गंगे’ योजना पर उठे सवाल
2018 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ‘नमामि गंगे’ योजना का उद्देश्य गंगा की सफाई और संरक्षण था। प्रयागराज में वर्षों से गंगा सफाई के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।

जानकारी के अनुसार:

  • 2013 तक प्रयागराज में केवल एक एसटीपी कार्यरत था।
  • बाद में शहर को सात सीवरेज जोन में बांटकर नए एसटीपी बनाए गए।
  • 2023 से 2025 के बीच कुल 9 एसटीपी स्थापित किए गए, जिनकी कुल क्षमता लगभग 340 एमएलडी बताई जाती है।

इसके बावजूद प्रतिदिन बड़ी मात्रा में सीवेज युक्त पानी बिना पूरी तरह शुद्ध हुए गंगा में जाने की बात सामने आ रही है।

सरकार और प्रशासन पर विपक्ष का निशाना
मामले को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने के बावजूद गंगा की सफाई को लेकर जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिखाई दे रहे। स्थानीय लोगों ने नगर निगम, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

जनता की भूमिका भी अहम: संत समाज
वहीं, संत समाज और कुछ स्थानीय नागरिकों ने केवल सरकार को जिम्मेदार ठहराने के बजाय आम लोगों की भूमिका पर भी जोर दिया।
सनातनी किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कौशल्या नंदगिरी ने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और “मां” का स्वरूप हैं। उन्होंने कहा कि लोग स्वयं भी गंगा में कचरा, पूजा सामग्री, साबुन और अन्य अपशिष्ट डालकर प्रदूषण बढ़ाते हैं। ऐसे में गंगा को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी समाज और सरकार दोनों की है।

महाकुंभ के बाद भी सवाल बरकरार
हाल ही में प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में करोड़ों श्रद्धालुओं ने गंगा में स्नान किया था। ऐसे में गंगा के जल की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर बहस और तेज हो गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो गंगा प्रदूषण का मुद्दा आने वाले समय में और गंभीर हो सकता है।

विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नदी की सतही सफाई पर्याप्त नहीं है। शहरों से निकलने वाले सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के स्थायी समाधान के बिना गंगा को पूरी तरह स्वच्छ बनाना संभव नहीं होगा।

गंगा को लेकर सरकार की योजनाएं और दावे लगातार जारी हैं, लेकिन जमीनी तस्वीर अभी भी कई सवाल खड़े कर रही है। प्रयागराज में सामने आए हालात यह संकेत देते हैं कि गंगा की वास्तविक सफाई के लिए केवल योजनाएं नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन और जनभागीदारी दोनों आवश्यक हैं।

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